लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरणों को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला। उन्होंने पहले अखिलेश को गुड मॉर्निंग कहा और फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट के जरिए तंज कसा। राजभर ने लिखा कि अखिलेश यादव अभी भी स्वप्नलोक में खोए होंगे, जबकि गाय-भैंस की सेवा करने वाला अहीर समाज जाग चुका है। उन्होंने दावा किया कि अब समाज के लोग सपा प्रमुख की राजनीति और उनकी नीतियों को समझने लगे हैं।
15 फीसदी और 85 फीसदी का मुद्दा उठाकर घेरा
ओपी राजभर ने अपने पोस्ट में यादव समाज के भीतर कथित जातीय भेदभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने लिखा, ‘हम अब तक यही जानते थे कि अहीर दो ही प्रकार के होते हैं! एक कृष्ण जी वाले, दूसरे वाले आप और आपके सपाई। लेकिन अब पता चल रहा है कि आप तो सच में अहीरों में भी 15 परसेंट वाले ही हैं और इस 15 परसेंट का बदला आप 85 परसेंट से ले रहे हैं।’
घोसी और कमरिया समाज को लेकर अखिलेश पर निशाना
राजभर ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव यादव समाज के सभी वर्गों को समान नजर से नहीं देखते। उन्होंने अपनी पोस्ट में घोसी यानी ग्वाला और कमरिया समाज का जिक्र करते हुए कहा कि सपा प्रमुख के लिए भी यादव समाज में अपने और पराए का अंतर है।
उन्होंने लिखा, ’85 परसेंट वाले घोसी यानी ग्वाला आपको बिल्कुल नहीं सुहाते, आपके लिए तो बस 15 परसेंट वाले कमरिया ही आपके अपने हैं।’ राजभर के इस बयान को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़े वर्गों और यादव समाज के जातीय समीकरणों को लेकर चल रही सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है।
2017 से 2024 तक सपा के टिकटों का मांगा हिसाब
कैबिनेट मंत्री ने अखिलेश यादव से सवाल किया कि वर्ष 2017 से 2024 तक हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी ने कितने घोसी यानी ग्वाला समाज के लोगों को टिकट दिया और कितने कमरिया समाज के प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने इस मुद्दे के जरिए सपा की टिकट वितरण नीति पर सवाल उठाए और अखिलेश पर यादव समाज के भीतर जाति के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया।
2027 में 2022 से भी बुरे नतीजों का दावा
ओपी राजभर ने अपनी पोस्ट के आखिर में अखिलेश यादव को जागने की नसीहत दी। उन्होंने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में 85 फीसदी वाला ग्वाला समाज सपा को 2022 से भी बुरे दौर का सामना कराने जा रहा है। राजभर के इस बयान से प्रदेश की राजनीति में जातीय प्रतिनिधित्व और पिछड़े वर्गों की भागीदारी को लेकर नई बहस छिड़ने के आसार हैं।
