न्यूज डेस्क, लखनऊ
लखनऊ। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाया जाने वाला हलषष्ठी (हरछठ) व्रत इस बार 2 सितंबर को मनाया जाएगा। षष्ठी तिथि का प्रारंभ 2 सितंबर को सुबह 6:12 बजे से होगा और समापन 3 सितंबर को सुबह 4:25 बजे होगा। उदया तिथि के अनुसार पर्व 2 सितंबर को मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल ने बताया कि हलषष्ठी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। बलराम जी का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल माना जाता है, इसी कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे शेषनाग के अवतार थे और गदायुद्ध में विशेष रूप से निपुण थे। कौरव राजकुमार दुर्योधन उनके शिष्य थे।
इस दिन हल और कृषि उपकरणों के पूजन का विशेष महत्व है। इसे हलछठ, पिन्नी छठ और खमर छठ के नाम से भी जाना जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में इसे ललई छठ भी कहा जाता है।
मान्यता है कि माताएं संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान अनाज का सेवन नहीं किया जाता। हल से जुती हुई जमीन में पैदा होने वाले अनाज और सब्जियों का भी उपयोग नहीं किया जाता। इसके बजाय तालाब या जलाशय में पैदा होने वाली चीजों जैसे तिन्नी का चावल, केर्मुआ का साग और पसही के चावल का सेवन किया जाता है। व्रत में गाय के दूध, दही और गोबर आदि का प्रयोग भी वर्जित माना गया है।
व्रत के दिन महिलाएं घर या बाहर दीवार पर छठ माता का चित्र बनाती हैं। इसके बाद भगवान गणेश और माता गौरा की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं जमीन को लीपकर घर में छोटा तालाब बनाती हैं और उसमें झरबेरी, पलाश व कांसी के पौधे लगाकर पूजा-अर्चना करती हैं। इसके बाद हलषष्ठी की कथा सुनी जाती है।
ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केंद्र, अलीगंज, लखनऊ के अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से हलषष्ठी व्रत करने से भगवान हलधर संतान को दीर्घायु और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
