रिपोर्ट: प्रिया बाजपेयी शुक्ला
रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त को मनाया जाएगा। त्योहार को लेकर देशभर के बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सज गए हैं। इस बीच ग्वालियर में कुछ महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए अनोखी और ईको-फ्रेंडली राखियां तैयार की हैं। खास बात यह है कि इन राखियों को देसी गाय के गोबर से बनाया जा रहा है।
इन राखियों को तैयार करने में प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इन्हें इस तरह बनाया गया है कि इस्तेमाल के बाद पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बजाय ये खाद के रूप में काम आ सकें। राखियों में तुलसी के बीज भी मिलाए गए हैं। यानी राखी को इस्तेमाल करने के बाद अगर इसे मिट्टी या गमले में डाल दिया जाए तो इससे तुलसी का पौधा उग सकता है।

सेना के जवानों को भेजी जाएंगी राखियां
इन खास राखियों को सीमा पर तैनात सेना के जवानों के लिए भी भेजा जा रहा है। देश की रक्षा में जुटे जवानों के प्रति सम्मान और भाईचारे की भावना के साथ इन राखियों को तैयार किया गया है।
राखियां तैयार करने वाली लेखिता सिंघल के मुताबिक, वह पिछले करीब दो वर्षों से इन राखियों की ऑनलाइन सप्लाई कर रही हैं। उनका कहना है कि इन राखियों को तैयार करने का उद्देश्य सिर्फ कमाई करना नहीं, बल्कि लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना भी है।

गोबर से तैयार हो रही अनोखी राखियां
ग्वालियर में महिलाओं का एक समूह देसी गाय के गोबर से इन हर्बल राखियों को तैयार कर रहा है। राखी को आकर्षक बनाने के साथ-साथ इसमें प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे यह सामान्य प्लास्टिक या सिंथेटिक राखियों से अलग बन जाती है।
इन राखियों की खासियत यह है कि त्योहार के बाद इन्हें फेंकने पर कचरे का बोझ बढ़ने के बजाय इन्हें मिट्टी में मिलाया जा सकता है। तुलसी के बीज होने के कारण इनके जरिए पौधा उगाने का भी विकल्प मिलता है।
आदिवासी महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया
ईको-फ्रेंडली राखियां तैयार करने का यह काम वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार का साधन भी बन रहा है। महिलाओं के समूह के जरिए राखियों का निर्माण और सप्लाई किया जा रहा है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं।
रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की यह पहल लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। एक तरफ जहां राखी भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प का प्रतीक है, वहीं इन ईको-फ्रेंडली राखियों के जरिए प्रकृति की रक्षा का संदेश भी दिया जा रहा है।
