HomeUncategorizedकसमंडी कलां विवाद: पुरातत्व सर्वे में मस्जिद और कब्रों के मिले प्रमाण,...

कसमंडी कलां विवाद: पुरातत्व सर्वे में मस्जिद और कब्रों के मिले प्रमाण, रिपोर्ट संस्कृति विभाग को सौंपी

लखनऊ। मलिहाबाद के कसमंडी कलां स्थित विवादित ढांचे को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य पुरातत्व निदेशालय ने अपनी सर्वे रिपोर्ट पर्यटन एवं संस्कृति विभाग को सौंप दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विवादित ढांचे की संरचना 17वीं-18वीं सदी की है तथा परिसर में मस्जिद और कब्रों के प्रमाण मिले हैं।

दरअसल, बीते दिनों लाखन आर्मी और सुहेलदेव आर्मी के पदाधिकारियों ने दावा किया था कि कसमंडी कलां में मौजूद मकबरा और मस्जिद मूल रूप से राजपासी राजा कंस का शिव मंदिर और किला था, जिसे बाद में दूसरे समुदाय के लोगों ने मस्जिद और मकबरे में बदल दिया। इस दावे के बाद क्षेत्र में विवाद बढ़ गया था।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात के निर्देश पर राज्य पुरातत्व विभाग की टीम ने बुधवार को विवादित स्थल का विस्तृत सर्वेक्षण किया। विशेषज्ञों की टीम ने करीब दो से तीन घंटे तक परिसर का निरीक्षण किया और वहां मौजूद संरचनाओं, निर्माण सामग्री तथा स्थापत्य शैली का अध्ययन किया।

पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, ढांचे के निर्माण में पारंपरिक लखौरी ईंटों और तत्कालीन कारीगरी का उपयोग किया गया है, जो 17वीं और 18वीं शताब्दी की स्थापत्य शैली को दर्शाता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि संरचना में इस्लामी वास्तुकला के प्रमुख तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इनमें किबला दीवार, मेहराब, गुंबद और मीनार जैसी विशेषताएं शामिल हैं।

सर्वेक्षण के दौरान मस्जिदनुमा ढांचे के भीतर चार कब्रें भी पाई गईं, जिन्हें रिपोर्ट में दर्ज किया गया है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परिसर में समय-समय पर मरम्मत और रखरखाव के कार्य किए गए हैं, जिससे मूल संरचना में कुछ बदलाव देखने को मिलते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, सर्वे रिपोर्ट को फिलहाल सुरक्षित रख लिया गया है। आवश्यकता पड़ने पर इसे मुख्यमंत्री के समक्ष भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

यह है पूरा विवाद

लाखन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पासी और सुहेलदेव आर्मी के योगेश पासी ने दावा किया था कि वर्ष 980 से 1031 ईस्वी के बीच यह स्थल राजपासी राजा कंस के शिव मंदिर और किले के रूप में मौजूद था। उनका कहना है कि परिसर की दीवारों पर आज भी हिंदू परंपरा से जुड़ी आकृतियां दिखाई देती हैं, जो इसकी प्राचीन पहचान की ओर संकेत करती हैं।

वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि सरकारी अभिलेखों में यह भूमि कब्रिस्तान के रूप में दर्ज है। उनका दावा है कि यहां किसी प्रकार का नया निर्माण नहीं कराया गया है और सैकड़ों वर्ष पुराने मकबरे तथा मस्जिद में लंबे समय से धार्मिक गतिविधियां संचालित होती रही हैं। उनका यह भी कहना है कि इतने वर्षों बाद इस मुद्दे को उठाकर इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है।

RELATED ARTICLES

Most Popular